प्रयागराज: स्ट्रोक आज दुनिया में बीमारी से होने वाली विकलांगता (मॉर्बिडिटी) का सबसे बड़ा कारण है और ट्रॉमा के बाद मृत्यु (मॉर्टेलिटी) के मामलों में दूसरे स्थान पर आता है। स्ट्रोक के रिस्क फैक्टर्स अच्छी तरह से पहचाने जा चुके हैं, जिनमें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल (हाइपरलिपिडेमिया), स्मोकिंग, ड्र
स्ट्रोक मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है — इस्केमिक और हैमरेजिक। इस्केमिक स्ट्रोक तब होता है जब दिमाग की आर्टरी या वेन में ब्लड फ्लो कम हो जाता है। वहीं हैमरेजिक स्ट्रोक दिमाग की किसी आर्टरी के फटने से होता है, जो अक्सर एनीयूरिज़्म या AVM (आर्टेरियो-वीनस मालफॉर्मेशन) के कारण होता है।
मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के न्यूरोसर्जरी विभाग के वाइस चेयरमैन एवं एच.ओ.डी. और न्यूरो इंटरवेंशन विभाग के यूनिट हेड, डॉ. (प्रो.) दलजीत सिंह ने बताया ”भारत में यह लगातार देखा गया है कि सर्दियों के मौसम, खासकर नवंबर से जनवरी के बीच, स्ट्रोक के मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है। ठंड के कारण वासोस्पाज़्म होता है, जिससे ब्लड फ्लो कम हो जाता है और इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। इसी वासोस्पाज़्म से ब्लड प्रेशर भी बढ़ सकता है, जिससे आर्टरी कमजोर होकर फटने की आशंका रहती है और हैमरेजिक स्ट्रोक हो सकता है। इसी अवधि में एयर पॉल्यूशन भी बढ़ता है, जिसका सीधा संबंध स्ट्रोक से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। दुनिया भर में एयर पॉल्यूशन लगातार बढ़ रहा है। एशिया और सेंट्रल अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में सेरेब्रोवैस्कुलर डिज़ीज़ का रिस्क अधिक है, क्योंकि यहां PM2.5 जैसे फाइन पार्टिकुलेट मैटर का लेवल ज्यादा रहता है। पिछले दो दशकों से इस ट्रेंड को देखा जा रहा है, जिसके चलते संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी प्रदूषण नियंत्रण के लिए नीतियां बनाने की चेतावनी और सिफारिशें दी हैं।“
प्रदूषण से होने वाले लगभग 85 प्रतिशत स्ट्रोक के मामले लो और मिडिल इनकम देशों में सामने आते हैं, जहां तेज़ी से इंडस्ट्रियलाइज़ेशन हो रहा है। प्रदूषण के मुख्य स्रोतों में बायोमास फ्यूल, खेतों में पराली जलाना, घरेलू जलन, ट्रैफिक, कंस्ट्रक्शन और इंडस्ट्रीज़ का वेस्ट शामिल है। घर के अंदर और बाहर, दोनों तरह का एक्सपोज़र स्ट्रोक के रिस्क को बढ़ाता है। किसी प्रदूषण फैलाने वाली यूनिट के पास रहना एक्सपोज़र को और बढ़ा देता है, जिससे खतरा और गंभीर हो जाता है।
डॉ. (प्रो.) दलजीत ने आगे बताया “प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को ठोस (सॉलिड) और गैस के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। सॉलिड पार्टिकल्स का आकार 0.1 से 10 माइक्रॉन तक होता है। आकार के आधार पर इन्हें कोर्स (<10 μm), फाइन (2.5–10 μm) और अल्ट्रा-फाइन (<0.1 μm) में बांटा जाता है, जिन्हें आमतौर पर PM10 और PM2.5 कहा जाता है। एयर पॉल्यूशन का असर दिल, फेफड़े, त्वचा, आंखों और दिमाग पर पड़ता है। दिमाग पर इसका प्रभाव स्ट्रोक के साथ-साथ डिमेंशिया, पार्किंसन और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों का रिस्क भी बढ़ा सकता है। एयर पॉल्यूशन के कारण अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में भी बढ़ोतरी होती है। नवंबर, दिसंबर और जनवरी के महीनों में ऐसी भर्तियां अधिक देखी जाती हैं, जिन्हें “स्ट्रोक मंथ्स” कहा जाने लगा है। क्रिसमस और न्यू ईयर के आसपास की छुट्टियों को भी कई जगह “स्ट्रोक सीज़न” के रूप में जाना जाता है।“
एयर पॉल्यूशन से इस्केमिक और हैमरेजिक, दोनों तरह के स्ट्रोक के मामले सामने आए हैं। इसका रिस्क पहले से मौजूद हार्ट या लंग डिज़ीज़, अधिक उम्र, डायबिटीज, प्रदूषण की मात्रा और एक्सपोज़र की अवधि पर निर्भर करता है।
वैज्ञानिक प्रमाण लगातार बढ़ रहे हैं कि कम समय और लंबे समय — दोनों तरह का प्रदूषण एक्सपोज़र स्ट्रोक का कारण बन सकता है। PM2.5 और NO₂ में हर 10 µg/m³ की बढ़ोतरी से स्ट्रोक का खतरा 4 से 16 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। कई स्टडीज़ में यह भी पाया गया है कि अस्पताल में भर्ती होने से 1 से 5 दिन पहले का प्रदूषण एक्सपोज़र एक महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत हो सकता है।
जब रोज़ाना प्रदूषण में अचानक और ज्यादा उतार-चढ़ाव होता है, तो स्ट्रोक का खतरा और बढ़ जाता है। ऐसे पैटर्न खासतौर पर एशियाई देशों में अधिक देखने को मिलते हैं। एयर पॉल्यूशन से स्ट्रोक कैसे होता है, इसका मैकेनिज़्म अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इसमें जहरीली गैसों का शरीर में फैलना, PM2.5 का अंदर जाना, इंफ्लेमेशन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, एंडोथीलियल डैमेज और ऑटोनॉमिक डिसफंक्शन जैसी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं।
सर्दियों में स्ट्रोक के मामलों में जो चिंताजनक बढ़ोतरी देखी जा रही है, उसका गहरा संबंध एयर पॉल्यूशन से हो सकता है। यह समय समाज के लिए आत्ममंथन का है, वैज्ञानिकों के लिए और गहराई से रिसर्च करने का है, और सरकार के लिए तेज़ी से प्रभावी नीतियां बनाकर प्रदूषण को कम करने का। तभी इस गंभीर स्वास्थ्य चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकेगा।

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